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हिंदी ही होगी विश्व नेट की भाषा ‘ बिंदी ‘

Image हिन्दी की विकास यात्रा का उद्गम ही उसके निंतर बढती जन स्वीकार्यता का उद्घोष करता है।हिंदी की दुर्दशा की घोषणा करते  अधिकाँश मतों से असहमत होते हुए ,यह बात पूरी शिद्दत से कही जा सकती है कि दुनिया का एलिट वर्ग चाहे इसे गरीबों की या फिर बाजारू भाषा कहले ,आने वाले वक्त में ,यही बड़ी आबादी से संपर्क का माध्यम होगी। और वे लोग जो इसे अछूत मान इससे दूरी बनाये है ,इसकी  शब्दावली ,साहित्य और ज्ञान -विज्ञान के भण्डार को समृद्ध करते नज़र आयेगें।अनेक लोग इस आशावादी नज़रिए से असहमत हो सकते हैं किन्तु भारतीय उपमहाद्वीप के पुराने पंजाब ,राजस्थान ,मध्य प्रदेश ,बिहार ,सयुंक्त प्रान्त की आंचलिक बोलियों की शब्दावली ,भाषा लावण्य ,और भाव  बोध को समेट रूप निखारती हिंदी को देखेगें तो मुग्ध हुए बिना न रहेगें। दुनिया के कोने -कोने में निवास कर रहे हिंदी भाषी और  प्रेमी अपनी पहचान व संस्कृति को अक्षुण बनाये रखने के लिए हिंदी  ही का सहारा लिए है.। विश्व पटल पर अनेक विश्व हिंदी सम्मेलनों का आयोजन कर हिंदी ने दुनिया के लोगो का ध्यान अपनी उपयोगिता ,गुणवत्ता और व्यापकता की और खींचा है।अमेरिका में वर्ष 2007 में आयोजित नौवें हिंदी सम्मलेन के अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि यू एन ओ के सचिव बाई केय मून ने हिंदी की बढती उपयोगित और सवांद की अन्तरराष्ट्रीय भाषा बनने पूरी संभावना को रेखांकित किया था।उन्होंने कहा कि “कुछ तकनिकी वज़हों से भले ही हिंदी UN की भाषा न बन पाए किन्तु यह विश्व संवाद की दुसरे नंबर की भाषा बन चुकी है।”                                                                                                                               ऐसे समय जबकि दुनिया में प्रतिदिन हज़ारों बोलियाँ और सैकड़ों भाषाएँ मर रही हों तब हिंदी भाषा की उत्तरोत्तर बढती लोकप्रियता उसकी ताकत का एहसास कराती है| भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण जो 2010 में श्री गणेश दवे की अध्यक्षता में गठित किया गया था के अनुसार इस सदी  के अंत तक हिंदी को मातृभाषा मानने व् बोलने  वालो की संख्या  अंग्रेजी बोलने वालो के बराबर हो जाएगी। प्रख्यात मार्क्सवादी लेखक राम विलास शर्मा ने वर्षों पहले लिखे एक लेख में भारत की ह्रदय स्थली प्रान्तों उत्तर प्रदेश ,बिहार ,मध्य प्रदेश ,राजस्थान ,हरियाणा ,हिमाचल और उन से  सटे भू -भाग में हिंदी राष्ट्रीयता के मजबूत हो कर उभरने का उल्लेख किया है ,जिसका आधार ही हिंदी भाषा है।इन क्षेत्रो में रह रहे लोगो की राष्ट्र निर्माण और ज्ञान -विज्ञान की दुनिया में कुछ कर दिखने की जो ललक दिख रही है वह हिंदी की पहचान और प्रगति की सबसे बड़ी ताकत है। हाँ ,यह स्वीकारने में भी कोई झिजक नहीं है की हिंदी बाजारू भाषा है। लगभग 40 करोड़ की आबादी का हिंदी भाषी उपभोक्ता बाज़ार दुनिया के अंग्रेजीदां उत्पादकों को प्रतिस्पर्ध में बने रहने के लिए हिंदी जानने और अपनाने को विवश कर रहा है। बाज़ार के रास्ते ही सही हिंदी, दरबार ,न्याय और विश्व विद्ध्यालई भाषा का दर्ज पाने का सफ़र तय करेगी। जहा कभी विज्ञापन और मोडलिंग की दुनिया में हिंदी भाषी कार्मिको और विशेषज्ञों को हेय दृष्टि से देखा जाता था अब सर आँखों पर बैठाया जा रहा है। टीवी चेनल और समाचार पत्रों की बढती प्रसार संख्या हिंदी भाषा के पुष्ट होने का प्रमाण है।                                  हिंगलिश ही सही बाज़ार ,मोबाइल और इंटरनेट के जरिये गैर हिंदी भाषी लोगो तक हिंदी पहुंची ही नहीं अपितु उनमे इसेजानने  और प्रयोग में लेन की रूचि बढ़ी है। वैसे भी किसी भी सशक्त भाषा का इतिहास उठ कर देखलें वह अपने प्रारंभ काल में बाजारू और मिश्रित ही रही है| बाज़ारऔर जन संवाद  के यही दबाव अशोक काल में पाली के इस्तेमाल ,मुग़ल काल में अरबी -फ़ारसी के इतर उर्दू की स्वीकार्यता और फिर इंग्लिश के समानंतर हिंगलिश और फिर हिंदी को उसके वाजिब शिखर सम्मान की ओर गति देंगे। हाँ ,नेट की अंतर्राष्ट्रीय दुनिया में हिंदी को प्रतिस्पर्धा के लिए ब्लॉग ,वेब साईट की दिजाइनिग ,आलेख ,प्रस्तुति ,भाषा सौष्ठव, विषय वास्तु आदि जैसे तकनिकी विधाओं में पारंगत होना होगा। भविष्य हिंदी का है। दुनिया हमारे हुनर ,मेधा और क्षमता की कायल है। हिंदी प्रेमी नौजवान पीढ़ी अंतर्राष्ट्रीय जगत में जिस विशिष्ट पहचान के लिए तड़फ रही है वह उसे भारतीयता की जड़ों में और फिर हिंदी अपनाने से ही मिलेगा ,यह तय है। आइये ! हिंदी दिवस पर अधिकाधिक प्रयोग का संकल्प ले इस अभियान में योगदान दे।                                                              

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श्री कृष्ण -भारतीय लोक समृधि के महानायक

                                                                                 भारतीय उपमहाद्वीप के हजारो साल की सभ्यता -संस्कृति ,साहित्य -कला , धर्म -कर्म और नानाविध लोकविधाओं के “स्मृति- सागर” मंथन से जो रत्न मानव जाति  को प्राप्त हुए ,उनमे जिन दो नायक रत्नों को  सर्वोपरि स्थान मिला वह हैं  राम और कृषण ।  श्री राम यदि भारतीय लोकजीवन के ताने -बाने के सबल रेशे और  उसकी मर्यादा हैं तो  उससे निर्मित लोकमन की भावना के रूप,रस और रंग से सरोबर अभिव्यक्ति के  चितेरे श्री कृषण हैं। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व पर आज से और मुझ से पहले असंख्य ऋषियों ,संतो ,भक्तो विद्वत जानो और मनीषियों ने जी भर कर लिखा है। उन पर हम जैसे साधारण जन के लिए कुछ लिख पाना एक चमत्कार ही है। श्री कृषण जन्माष्टमी पर कुछ लिखने का विचार मन में आना यश पाने  का एक प्रलोभन ही है जिसके वशीभूत शब्द अंकन किये जा रहे हैं।                                                                                                                                 श्री कृषण के जितने भी रूप लोकस्मृति में बसें हैं उन में से हर एक पर अनवरत लिखा जा सकता है। पर मुझे वें काल खंड के उस अन्धकार में खड़े अति  सुदार्श्नीय नायक के रूप में दिखाई पड़ते हैं जो भाग्य के अभिशाप को कर्म से तोड़ने ,जीवन की नीरसता ,नीरवता को प्रेम ,संगीत ,नृत्य और लोकरंजन के उत्सव से भर देने को मशगूल है। और वह कार्य उनके लोप हो जाने से थमा नहीं उनकी स्मृति के चारो ओर आज भी जारी है। मुझे वह निर्धनता के चक्र को तोड़ने मथुरा से द्वारका जा बसने और समुद्र व्यापार के जरिय धन- एश्वर्य के बल पर भारतीय राजनीति के धुरन्धरों को ललकारते नज़र आते हैं। वें मुझे विदेश व्यापार और खुली अर्थव्यवस्था के प्रणेता नज़र आते हैं। इस समृधि को उन्होंने द्वारका तक सिमित नहीं रखा ,उसका विस्तार जम्बुद्विप के पूर्वी सिरे पुरी तक किया जहां वें स्वयं बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ प्रतिष्ठित हुए। यहाँ से पूर्वी देशों के साथ व्यापार हुआ। और यह संभव है की द्वारका से समुच अरब सागर और दजला -फरहा नदियों के साहारे रोम और यूनान तक समृधि और संस्कृतियों का आदान-प्रदान हुआ।सच यह भी है कि बंगाल  की खाड़ी से ले हिन्द और अरब सागर पर श्री कृष्ण के व्यापारिक जहाजी बेड़ों का अधिपत्य रहा  और  द्वारका ,पुरी और मथुरा सहित बड़ा भारतीय भू -भाग कृषणमय हो चुका था।  समृद्ध साम्राज्य स्थापित करलेने के बावजूद वे उसके राजा नहीं हैं ,वें अपने निर्धन बाल सखा को नहीं भूले। यह उनके उददात चरित्र की उदारता है।यहाँ श्री कृष्ण मुझे आज के कारपोरेट सेक्टर के सोशियल रिस्पोंसबिलिटी को अंजाम देते दिखाई पड़ते हैं।                                                                                           इसी वैभव ,धन-धान्य और कृष्ण शक्ति से इर्ष्या और जीत लेने की कामना के वशीभूत एक शक्ति शाली शासक काल यवन ने श्री कृष्ण पर अनेक हमलें किये । किन्तु श्री कृष्ण ,वें काल यवन से लड़े  नहीं रणछोड़ कहलाना पसंद किया। लड़ते तो विनाश अवश्यम्भावी था।बड़े यत्न से प्राप्त रीद्धियों  -सिद्धियों बचाए रखना कही ज्यादा जरुरी था।  परन्तु जब सत्य के पक्ष में लड़े तो महाभारत रचा और युद्ध की विभीषिका और विनाश की चिंता नहीं की ,स्वयम का राज्य ,यदुवंशियों का राज्य भी छिन  -भिन हो जाने दिया ,रोकने का प्रयास भी नहीं किया।धैर्ये और आत्मविश्वास इतना कि ,रणक्षेत्र की निराशा ,भय और आशंकाओं के बीच, बिना विचलित हुए अपने परम प्रिये अर्जुन के माध्यम से भक्ति ,ज्ञान और कर्म योग का अंतर और रहस्य दुनिया को समझा गए । उन्होंने सागर मंथन से प्राप्त मक्खन खाया ही नहीं अपितु समूचे भारत में विस्तारित कर दिया।                                                                                                                                  और अंत में,इन्डियन माय्थोलोजी के धुरंधर विद्वान राबर्टो क्लासों  की पुस्तक का  यह अंश जो ,श्री कृष्ण को माध्यम बना लिखे गए समूचे साहित्य को विश्राम देता मुझे लगता है ,प्रस्तुत कर रहा हूँ ,–” तब कृष्ण पांच वर्ष के थे। यशोदा कृष्ण को गोदी में लिए बैठी थीं और अपने लाडले को माक्खन खिल रही थीं। कान्हा का सांवला -सलोना चेहरा चाँद सा चमक रहा था। खाते हुए माखन उनकें होंठो से छाती पर टपक रहा था। एक तरफ छिपकर कड़ी दो गोपियाँ इस अदभुत दृश्य का आनंद ले रही थीं। उन्हें तो भगवान के दर्शन हो रहे थे। यदि इसका अर्थ अपने प्रिये के प्रति पूर्ण समर्पण था तो सच में यह वही था। यहाँ भौतिक जगत और ईश्वर परस्पर एक हो रहे थे। यही था सृष्टि का आरम्भ जहां सब कुछ उसमे समाया हुआ था। गोपियों को लग रहा था मानो वे अपने आराध्य से जा मिली हों।  ” श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ। —सुरेन्द्र सिंह आर्य  (२५/०८ /१३ )

 

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ज़मीन से बेदखल होते एससी -एसटी के कमजोर लोग

ज़मीन से बेदखल होते एससी -एसटी के कमजोर लोग.

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ज़मीन से बेदखल होते एससी -एसटी के कमजोर लोग

देहरादून,(यू आइ एस) राजधानी के पछ्वादून परिक्षेत्र में दो दर्जन से ज्यादा गावों की हज़ारो हेक्टियर ज़मीन के मालिक बोक्सा जनजाति और हरिजन समुदायों के लोग ज़मीं से बेदखल हो दिहाड़ी के मजदूर हो कर रह गए हैं । विकास योजनाओं तथा आबादी के बढ़ते दबाव की मांग ने भूमि हस्तांतरण मामलो में तेजी ला दी है जिसने इस क्षेत्र की जनसांख्यकी के स्वरुप को बदल दिया है ,जिसका असर राजनितिक समीकरणों पर स्वाभाविक तौर पर पड़ेगा । किन्तु मिल रही सूचनाये इससे इतर आसन्न सामाजिक और राजनितिक सवालों के खड़े होने के संकेत भी दे रही हैं ।                                                                                                     समाज में बदलते आर्थिक समीकरणों की यह विडम्बना ही है कि जिस आरक्षण का सहारा ले कर ,आर्थिक ,सामाजिक ,और शैक्षिक तौर पर सशक्त हो गए लोग,उनकी सुरक्षा के लिए बने प्रावधानों की आड़ में अपने ही समाज के कमजोर परिवारों को उनकी ज़मीन से बेदखल करने में लगे हैं ।जानकारी के मुताबिक़ सत्तारूढ़ पार्टी के राजनितिक गल्यारे में मज़बूत रसूक  रखने वाले एसटी और एससी समुदाय के दो -चार लोग असंक्र्मनिय भूमि की खरीद -फरोख्त में लगे हैं । विकास नगर और सहसपुर विधान सभा क्षेत्र में दलित तथा बोक्सा जनजाति केएक अनुमान के अनुसार 45000  लोग सिंघनिवाला ,चक्मनसा ,शेरपुर ,सभावाला .तिरपुर ,डांडीपुर ,मेदनीपुर ,प्रतीतपुर ,अद्दुवाला ,धर्मवाला ,भूडपुर ,धूलकोट आदि गावों के बोक्सा और झिंवरहेड़ी ,नाथूवाला ,सभावाला ,कांडोली ,जीवनगढ़ ,बनियावाला ,केहरि ,बड़ोवाला आदि गावों के हरिजन सदियों से निवास करते आ  रहे हैं । जिनमे से ज्यादातर आबादी छोटी जोत के सहारे गुजर -बसर करती रही  हैं । उनकी इसी कमजोरी का लाभ उठाते हुए संपन्न एसटी और एससी नेताओ ने उनकी ज़मीनों को औने -पौने दामो में खरीद कर एकत्र  भूमि को बेचने का धंधा अपना लिया है । बोक्सा  समुदाय से खरीदी गई ज़मीनों को पहाड़ से स्थानांतरित हो कर देहरादून बस रहे संपन्न जौनसारी ,भोटिया और मारछा लोगो को बेचीं जा रही है । वहीँ दलित समाज से खरीदी गई ज़मीन ऊँचे दामो में बाहर से आ रहे बिल्डरों को बेचीं जा रही है । सामान्यत: भू -स्वामित्व परिवर्तन के इस खेल में कोई खोट नज़र नहीं आता । परन्तु जब सामाजिक और राजनितिक कार्यकर्ताओ से विषय पर चर्चा की गई तो परिणामो की गंभीरता का एहसास होता है । सहसपुर के अनेक गाँव जो बोक्सा जनजाति से आबाद थे,खाली  हो गए है । दलितों की भूमि पर और ही लोगो का अधिकार हो गया है ।                                                                                             हाँलाकि ,यह खेल परस्पर सहमती और सरकारी मशीन से मिलीभगत से मौजूदा कानूनों की आड़ में हो रहा है ,पर इसके परीणाम स्वरुप लगभग 25 -26 हजार हैक्तियर भूमि पर से  इस विस्थापन ने ग्रामसभा से ले विधानसभा तक के सभी पदों  के चुनाव परिणाम तय करना इन समुदायों के हाथ से निकल जौनसारी और अन्य क्षत्रो के लोगो के अधिकार में आ गया है । क्षेत्र के राजनितिक कार्यकर्ताओं का तो यहाँ तक कहना है कि संपन्न हो गए जौंसारियो ,भोटियो और मारछाओं के दबदबे ने राज्य के बोक्सा और थारू जनजाति को ज़मीन से ही नहीं बाकी अधिकारों से बेदखल कर दिया है । राजकीय सेवाओं में इनकी संख्या न के बराबर है । केंद्र से स्पेशल कम्पोनेंट प्लान के तहत ग्राम्य विकास और समाज कल्याण की  सभी योजनाओं से ये इन समुदायों को वंचित होना पड़ा है । इन योजनाओं के तहत आने वाला धन गावों में  जनसंख्या स्वरुप के बदल जाने से उनकी विकास योजनाओं में न लग कर अन्यत्र प्रयोग होरहा है।                                                          अपनी आर्थिक और शैक्षिक कमजोरियों के इनकी राजनैतिक ताकत भी समाप्त प्राय  हो गई जिस कारण उनकी समस्याओं के समाधान पर किसी का ध्यान नहीं जाता । सहसपुर और विकासनगर के राजनैतिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जौनसारी अपनी राजनैतिक हैसियत के कारण जनप्रतिनिधित्व कानून को धता बता कर दो स्थानों की मतदाता सूची में शामिल रहता है और जरुरत  पड़े पर अपने सवर्ग के प्रत्याशी को वोट करने वहां चले आते है । इनके क्षेत्र में बाहर का निवासी ज़मीन नहीं खरीद सकता किन्तु ये लोग कहीं भी कृषि और गैर कृषि भूमि खरीद कर वहां की सामाजिक ,राजनैतिक और आर्थिक संतुलन के समीकरणों को बिगाड़ देने में प्रभावी भूमिका में आ गए है । -सुरेन्द्र सिंह आर्य (19 /08 /13 )

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इतिहास के शब्दों में -आज़ादी और स्वराज, क्या पाया आज

                                  देहरादून, (9august kranti diwas ) अतीत में घूमना अच्छा लगता है। वहां दिल -औ -दिमाग को झकझोर देने वाली वर्णित घटनाओं और शब्दों से रूबरू होना, विचार की एक नई खिड़की के खुलने का एहसास दे जाता है । और यह आंकलन भी कि काल के अंतराल किसी कौम ने क्या खोया और पाया ?भारत के महान नेता सी . राजगोपालाचारी की डायरी के कुछ अंश पढ़ना एसा ही एहसास है ।                                                    From the DAIRY of great Indian leader late C.Rajagopalachari . In the light of 9th August Kranti Diwas and coming 66th independence day 2013. Whatever he had written in his dairy on Tuesday ,24th january 1922 ,is still true,relevant ,considerable and press to us to think ,that ,how far we travelled to achieve our freedom movement goal, the SWARAJ.                                                                                                                We all ought to know that SWARAJ will not at once  or,I think,even for a long time to come,be better Government or greater happiness  for the people. Election and their Corruption,Injustice and the power and Tyranny of Wealth, and Inefficiency of administration will make a  HELL of Life as soon as freedom is given to US.       The only thing gained will be that as a RACE we will be saved from dishonours and subordination. Hope lies only in universal Education by which Right Conduct ,Fear of God,and Love ,will be developed among the citizens from Childhood . IT IS ONLY IF WE SUCCEED in this that SWARAJ will mean HAPPINESS.                                                                                महान नेता सी.  राजगोपालाचारी के एक -एक शब्द पर गौर करने की जरूरत है ,खासतौर पर उन्हें ,जिनको इस देश को  विरासत में पाने का दर्प है ,उन्हें जो सवेंदनशील हैं ,उन पत्रकार साथियों को जो आम आदमी के हक़ में आवाज़ बुलंद करने का विश्वास दिलाते हैं , और उन तमाम ब्राह्मणों से जो राष्ट्र और समाज क्र हित चिंतन का माद्दा रखते हैं ,जिनमे जमीर शेष बचा है । सोचे क्या आज़ादी के 66 साला सफ़र में ,हमने जिन्हें अब तक राष्ट्र और राज्य नायक चुना ,जिन पर हम आज भरोसा कर रहे हैं , वें हमें स्वराज सुख दिला  पाए ?                        श्री   राजगोपालाचारी  के 91 -92  वर्ष पूर्व वर्णित हालात आज भी जस के तस हैं । अक्षम शासन ,भ्रष्टाचार ,धन और शक्ति बल ने लोकतंत्र को ,राजाजी के शब्दों में कहें तो ,जीवन का नर्क बना डाला है । यही इस स्वतंत्रता दिवस का सच है । आओ , संकल्प लें बदलाव का ,स्वराज को सही मायने में पाने का।              

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कांग्रेस : जहाँ होंठो पे सच्चाई रहती है , से मचा कोहराम

  1. देहरादून (यु आई एस )उत्तराखंड कांग्रेस के प्रवक्ता धीरेन्द्र प्रताप से त्याग-पात्र लिए जाने की खबर है ,सम्भावना  है कि कड़वा सच बोलने के फलस्वरूप उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रभारी चौधरी वीरेंदर सिंह को भी पार्टी में उपेक्षा का दंश झेलना होगा                                                       इधर एक लम्बे समय से पार्टी के भीतर नेताओं की जुबान पर नियंत्रण के असफल प्रयास होते रहे है ,हालात की सच्चाइया है कि तमाम बन्धनों को तोड़ दिए जा रहे  बयान मीडिया की सुर्खी बन नेताओ के लिए मुसीबतें बढ़ा रहे है .धीरेन्द्र प्रताप ने नई दिल्ली जंतर-मंतर पर प्रदेश की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त करने की मांग को लेकर चल रहे धरना-प्रदर्शन में भाग लेकर मांग के समर्थन में भाषण दे डाला।  सच तो यही है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं कहा .प्रदेश की जनता भी तो पिछले दो महा से यही कह रही है. किन्तु वह यह भूल  गए कि उस वक़्त वे प्रदेश कांग्रेस और पार्टी अध्यक्ष के प्रवक्ता भी थे .प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री और अनुशासन समिति के सदस्य सचिव रहते उन्होंने बिना कारन जांचे किसी के हित लाभ के लिए अनेको को पार्टी से बहार का रास्ता दिखने की असफल कोशिशे की, आखिकार शिकारी खुद शिकार हो गया . सत्ता के खेल में सच की यही नियति है .यहाँ सच स्वीकारना और बोलना आपके ज़मीर पर आश्रित नहीं होता .                                                              कांग्रेस में  ऐसा करने वाले वह अकेले व्यक्ति नहीं है ,समय -समय पर अनेक नेताओं ने सच बोला और सत्ता के नेपथ्य में खो गए . उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रभारी चौधरी वीरेंदर सिंह ने भी जींद (हरियाणा ) की एक सभा में भारतीय राजनीति के हो रहे कुरूप चेहरे पर से पर्दा उठाने की गलती कर दी है ,उन्होंने राज्य सभा सीट की चल रही कीमत सौ करोड़ रूपए जनता को बता दी .पार्टियों में पद ,लोक सभा और विधान सभा के टिकट पाने का खर्च मांगा जाता है ,यह बात बिहार कांग्रेस  के कार्यकर्ताओं ने, पार्टी नेत्री मार्गरेट आलव ने और धीरेन्द्र प्रताप ने भी मीडिया में बयां दे कर स्वीकारी है .उत्तराखंड ,हिमाचल और दिल्ली कांग्रेस के प्रभारी रहते उन्होंने किस सीट और पद के लिए किस से कितना मांगा या पाया ,यह भी वह जनता को बता दे तो लोकतंत्र  से गंदगी दूर करने में मदद मिलेगी .                                               चौधरी वीरेंदर अपने बयान से पलट रहे हैं किन्तु उनके प्रतिद्वंदी श्री हुड्डा हैं कि पीछा छोड़ने को तैयार नहीं हैं .खबर है कि उन्हें अखिल भारतीय किसान कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जाने का प्रस्ताव अब रद्द हो गया है .  गलती इन में से किसी नेता की नहीं है ,यह दोष तो इस देश की माटी का है ,जिस देश में गंगा बहती है ,हम उस देश के वासी है ,जहाँ होठों पे सच्चाई रहती है जो वक़्त -बे वक़्त जुबा पे आ बयान बन कोहराम मच जाती है .  –सुरेन्द्र सिंह आर्य ।-01/08/13

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