बाज़ार भँवर में ग्राम स्वराज की गांधियन इकोनोमी

 गांधी जयंती पर विशेष –

                                                             सुरेन्द्र सिंह आर्य

गाँधी जयंती से पूर्व खादी ग्रामोद्योग आयोग ,भारत ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ग्राम स्वराज की आधार रही   खादी और अन्य उत्पादों को विश्वसनीयता की नई पहचान देने के उद्देश्य से ,विलेज इकोनोमी के स्पिनिग व्हील “चरखे “ को प्रतीक चिन्ह घोषित किया है । देर से ही सही खादी आयोग ने एक सही और आधुनिक बाज़ार की जरुरत की दृष्टिगत एक  कदम आगे बढाया है । किन्तु इस मौके पर यह मूल्यांकन भी जरुरी है की खादी और ग्रामीण उत्पादों की ज़मीनी हकीकत आज  क्या है ?

 

                       गाँधी जी ने व्यापक  भारत भ्रमण के दौरान ग्रामीण जनता को  बदहाली और संसाधन होते  भी बेकारी तथा परतंत्रता की जिन बेड़ियों जकड़ा पाया ,उस से निजात पाने का दूरगामी व स्थाई समाधान उन्होंने ग्राम स्वावलंबन में खोजा और ग्राम स्वराज का एक अनूठा दर्शन भारत को दिया । ग्राम स्वराज के इसी सपने को साकार करने के लिए ,भारत की आज़ादी के बाद केंद्र सरकार ने खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की स्थापना की । उद्देश्य था कि इसके माध्यम से ग्रामीण भारत में स्थानीय कच्चे माल के उपयोग से उपभोक्ता वस्तुओं का लाभकारी उत्पादन हो । रोज़गार के अवसर सुलभ हों जिससे ग्रामीण भारत आर्थिक तौर पर मजबूत ग्राम स्वराज को साकार कर सकें ।

इस उद्देश्य से देश के सभी प्रान्तों में इसके कार्यो के अंतर्गत खादी और ग्रामोद्योग में लगे कारीगरों के लिए प्रशिक्षण का आयोजन तथा उनमें सहयोगात्मक प्रयास की भावना उत्पन्न करने के अलावा, उत्पादकों की आपूर्ति हेतु कच्चा माल एवं औजारों के संग्रह को बढाना, अनिर्मित माल के रूप में कच्चा माल के प्रशोधन हेतु सामान्य सेवा सुविधा का सृजन तथा खादी और ग्रामोद्योगी उत्पादों के विपणन हेतु सुविधा का प्रावधान शामिल किये गए ।

उत्पादकता बढ़ाने,श्रम को कम करने एवं उनकी स्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने एवं ऐसे अनुसंधान से प्राप्त प्रमुख परिणामों के प्रचार-प्रसार की व्यवस्था करने की दृष्टि से गैर-परंपरागत ऊर्जा एवं विद्युत ऊर्जा के उपयोग के साथ-साथ खादी और ग्रामोद्योगी क्षेत्र में उपयोग लायी जा रही उत्पादन तकनीकी एवं औजारों में अनुसंधान को प्रोत्साहित एवं संवर्धित करने तथा इससे संबंधित समस्याओं के अध्ययन की सुविधा प्रदान करने का उत्तरदायित्व भी आयोग को सौंपा गया । साथ ही यह भी जिम्मेदारी आयोग को सौंपी गई कि –

आयोग खादी और ग्रामोद्योगों के विकास एवं कार्यान्वयन हेतु संस्थाओं तथा व्यक्तियों को वित्तीय सहायता प्रदान करेगा  तथा डिजाईन की आपूर्ति, प्रोटोटाइप तथा अन्य तकनीकी सूचना के माध्यम से उनका मार्गदर्शन भी करेगा  एवं खादी और ग्रामोद्योगी गतिविधियों को क्रियान्वित करने में, आयोग उत्पादों की वास्तविकता एवं गुणवत्ता मानक तथा मानक के अनुरूप उत्पादों को सुनिष्चित करेगा । यहाँ हमारा उद्देश्य ,खादी आयोग के कार्यो की समीक्षा करना नहीं है, अपितु आत्मनिर्भर ग्राम स्वराज के जिस महान संकल्प को साकार करने यह देश निकला था ,वह आज किस पड़ाव पर खड़ा है यह देखना है । आज खादी उत्पादों के रूप में हम रेशमी और सूती कपड़े ,जूट और नारियल रेशे से बने सामान ,प्रशोधित फल ,सब्जी ,दालें व खाद्यान ,शहद ,हस्त निर्मित कागज़ ,चमड़े से निर्मित उत्पाद तथा लकड़ी व लोहे से बने उपयोगी सामान । इन नानाविध उत्पादों से राज्यों के खादी बोर्डो एवं आयोग से मान्यता प्राप्त शो रूम भरे हैं । तो दूसरी और  उदारीकरण और वैश्वीकरण के कारण  खादी और ग्रामोद्योग क्षेत्र की  छोटी इकाइयों को बाज़ार में मौजूद बड़ी और आर्थिक तौर पर समपन्न इकाइयों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा  हैं।  भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा गांवों में जहां अभी भी निरक्षरता जस की तस है और बड़े उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों से कार्य बल को अवशोषित करने की स्थिति में नहीं है,में रहता है।स्थानीय संसाधनों और कौशल का उपयोग जितना अपेक्षित था नहीं हो पा रहा है । यह एक सच्चाई है कि खादी उत्पादों के नाम से जितना भी सामान बाज़ार में है उसका ९० प्रतिशत गांवों में नहीं, शहरो के आस पास स्थापित छोटी इकाइयों में बन रहा है ।

आज़ादी के बाद अपनाई गई मिश्रित अर्थव्यवस्था के पहले दशक ने ही गंधियन इकोनोमिकि का असली चेहरा दिखाना शुरू कर दिया था । विदेशी तकनीक और वस्तुओं के आयात ने उपभोक्ताओ की पसंद को बदल दिया था । उसे सुन्दर ,टिकाऊ और सस्ती वस्तुवें लुभा रही थीं जो लघु और माध्यम श्रेणी के कारखानों में बनी थी । इनके मुकाबले खादी ग्रामोद्योग क्षेत्र में बनी वस्तुवें बाज़ार में मांग के अभाव में दम तोड़ गई जिसका असर उत्पादन इकाइयों पर पड़ा और वे लडखडाती रही या बंद हों गई । १९९१ से आर्थिक नीतियों में आये बदलाव ने तो चीनी प्रतिस्पर्धा के आगे ग्रामीण काष्ठ ,मिनिएचर बल्ब ,चमड़े का सामान ,साबुन ,खिलोने व् सजावटी सामान की निर्माता इकाइयों को समेत दिया । खादी उत्पादों का  लगभग 50 हज़ार  करोड़ रूपये कीमत का सालाना उत्पादन और लगभग 55-56 हज़ार करोड़ की बिक्री तथा 115 करोड़ रुपये कीमत का रोज़गार अवसरों के साथ एक बड़ा बाज़ार मौजूद है। किन्तु खादी एवं ग्रामोद्योगिक उत्पादों का यह प्रभावशाली आकार और बाज़ार ,ब्याज और पूंजी पर केंद्र और राज्य सरकारों से मिलाने वाली सब्सिडी के बूते खडा हैं ।

दरअसल खादी और ग्रामीण उत्पादों की सब्सी बड़ी समस्या उसके कच्चे माल की गुणवत्ता ,उत्पादन के मानकी करण बेहतर तकनीक के उपयोग ,उपभोक्ता की रूचि और बाज़ार की मांग के अनुरूप डिज़ाइन ,पैकिंग के साथ उत्पाद के प्रमाणीकरण के अलावा कारीगरों को प्रशिक्षण की भी है।  इन सभी पहलुओ पर काफी ध्यान ,समय और धन खर्च करने के बाद भी ग्राम स्वराज की धुरी गांधियन इकोनोमी बाज़ार भँवर में फसी है। उत्तर भारत के 95 प्रतिशत गावों में अब चरखा नहीं चलता ,सूत नहीं काता  जाता ,जुलाहे नहीं रहे ,भेड़  पालन अलाभकारी धन्धा है इसलिए ऊन उद्योग भी बंद है । ग्रामीण जरुरत के काष्ठ और लोहे के उपकरण ,खिलोने ,घरेलु सामान बनाने वाले कारीगर गावों नहीं रहे वह पलायन कर शहरों में दिहाड़ी करने लगे हैं ।

Advertisements
This entry was posted in Uncategorized and tagged , , , , , , , , . Bookmark the permalink.

One Response to बाज़ार भँवर में ग्राम स्वराज की गांधियन इकोनोमी

  1. Pingback: बाज़ार भँवर में ग्राम स्वराज की गांधियन इकोनोमी | Uttrakhand Samwad

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s