विश्व शांति को तराशने होगें धर्म एकता के सूत्र

जैन धर्म को एक सत्य की खोज में २५०० साल चलना पड़ा। धर्म के दो पंथ दिगंबर और स्वेताम्बर ,वैचारिक समन्वय के मार्ग तलाश एकजुट हो गए हैं। धर्म के ज्ञात इतिहास में ऐसे बड़ी और महतवपूर्ण घटना इस से पूर्व नहीं सुनी गई। हम में से बहुतो के जैन न होते हुए भी इस एतिहासिक और धर्म दिशा प्रवर्तक निर्णय का स्वागत करना चाहिए ।                                                                                                                              धर्म तत्व और ईश्वर एक है। जिसको नानाविध शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है। किसी विषय पर विशद विचार की विशिष्ट शैली के उद्गम और पोषक केंद्र को स्कूल ऑफ़ थॉट और भारतीय वांग्मय में सम्प्रदाय शब्द से संबोधित किया गया है। दुनिया भर के विद्वत जनों ने आरम्भ से ही विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वीकार किया और पोषण भी। इसी का परिणाम है कि ज्ञान -विज्ञान ,धर्म -दर्शन ,इतिहास और साहित्य में आबद्ध समूहों की रचना होती रही। हम यदि धर्म -दर्शन के क्षेत्र पर ही ध्यान केन्द्रित करे तो पाते हैं की यहाँ तो सम्प्रदायों की भरमार है और ये सभी परस्पर स्वयं के श्रेष्ठ होने के आग्रह images (2) Religonसे टकराते रहें हैं और दीखते हैं।                                                                                                              धर्म चाहे सभ्यता के विकास क्रम में उपजा हो या फिर किसी ज्ञानमय व्यक्ति द्वारा आरम्भ किया गया हो समय के साथ उसमे वैचारिक भिन्नता और सम्प्रदायों का बढ़ते जाना एक स्वभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है। जैन धर्म के समकालीन बौध धर्म भले ही एक के विचार दर्शन पर आधारित रहा हो किन्तु समय के साथ -साथ वहां महायान और हीनायन पन्थ स्थापित हुए। २००० वर्ष पहले क्रिश्चन धर्म की स्थापना के कुछ समय बाद वह दो वैचारिक धाराओं, कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट में बाँट गया। लगभग १५०० वर्ष पूर्व अस्तित्व में आने के कुछ समय के बाद इस्लाम भी प्रमुख रूप से शिया और सुन्नी और भारत में बरेलवी और देवबंदी धाराओं में बँट गया। वैदिक हिन्दू धर्म तो असंख्य मत -मतान्तरों में बंटा है और यही इसकी खूबी तथा संकट भी है। तब यह बात हैरत में डालने वाली ही है कि सत्य की खोज और उसको जन- जन तक पहुँचाने के क्रम में वह विचार और पद्धति की अनेक धाराओं और उप -धाराओं में आकार लेने लगता है। जब सम्प्रदाय की श्रेष्ठता के लिए आग्रह संगठित हो कर करता है तो किन्ही दो या अधिक में टकराव लाज़मी परिणाम है। आधुनिक सभ्य और पहले से अपेक्षाकृत ज्ञानवान समाज की बड़ी चिंता और समस्या इन सम्प्रदायों के बीच बढ़ता हिंषक  टकराव है|समूची दुनिया धार्मिक अलगाव वाद और परस्पर वैमनष्य की आग में जल रही है। हजारो बेगुन्हा लोग धर्म की श्रेष्ठता स्थापित करने अथवा स्वीकार न करने के कारण मार दिये जा रहे हैं।                                                                                                                              जिस एकल बिन्दु से सृष्टि रचना और उसके कर्ता को जानने की मनुष्य मन की यात्रा आरम्भ हुई थी वह तत्व और सत्व एक है। यह बात हम सभी जानते और मानते है फिर भी उस सत्व तक पहुँचाने में जैन धर्माचार्यों को २५०० साल क्यों लगे? एक ही धर्म-ध्वजा को लेकर चल रहे दो पंथ इस बीच एक होकर क्यों नहीं बैठे ?जब एक ताने की दो शाखाओं के हाल यह है तो अलग -अलग विचार केन्द्रों पर खड़े सम्प्रदायों को कैसे समन्वय मार्ग पर लाया जाए? ऐसा किया जाना आज की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।  इसी बिंदु पर जैन धर्माचार्य हमारा मार्ग दशन करते लग रहे हैं। वें एकता के जिस भी सूत्र को थाम आगे बढे है ,आशा की जानी चाहिए कि ,अन्य धर्माचार्य भी ऐसे ही किसी सूत्र का हाथ थाम विश्व शांति और मानव कल्याण का मार्ग प्रसस्त करेगें। —-सुरेन्द्र सिंह आर्य

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