हिंदी ही होगी विश्व नेट की भाषा ‘ बिंदी ‘

Image हिन्दी की विकास यात्रा का उद्गम ही उसके निंतर बढती जन स्वीकार्यता का उद्घोष करता है।हिंदी की दुर्दशा की घोषणा करते  अधिकाँश मतों से असहमत होते हुए ,यह बात पूरी शिद्दत से कही जा सकती है कि दुनिया का एलिट वर्ग चाहे इसे गरीबों की या फिर बाजारू भाषा कहले ,आने वाले वक्त में ,यही बड़ी आबादी से संपर्क का माध्यम होगी। और वे लोग जो इसे अछूत मान इससे दूरी बनाये है ,इसकी  शब्दावली ,साहित्य और ज्ञान -विज्ञान के भण्डार को समृद्ध करते नज़र आयेगें।अनेक लोग इस आशावादी नज़रिए से असहमत हो सकते हैं किन्तु भारतीय उपमहाद्वीप के पुराने पंजाब ,राजस्थान ,मध्य प्रदेश ,बिहार ,सयुंक्त प्रान्त की आंचलिक बोलियों की शब्दावली ,भाषा लावण्य ,और भाव  बोध को समेट रूप निखारती हिंदी को देखेगें तो मुग्ध हुए बिना न रहेगें। दुनिया के कोने -कोने में निवास कर रहे हिंदी भाषी और  प्रेमी अपनी पहचान व संस्कृति को अक्षुण बनाये रखने के लिए हिंदी  ही का सहारा लिए है.। विश्व पटल पर अनेक विश्व हिंदी सम्मेलनों का आयोजन कर हिंदी ने दुनिया के लोगो का ध्यान अपनी उपयोगिता ,गुणवत्ता और व्यापकता की और खींचा है।अमेरिका में वर्ष 2007 में आयोजित नौवें हिंदी सम्मलेन के अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि यू एन ओ के सचिव बाई केय मून ने हिंदी की बढती उपयोगित और सवांद की अन्तरराष्ट्रीय भाषा बनने पूरी संभावना को रेखांकित किया था।उन्होंने कहा कि “कुछ तकनिकी वज़हों से भले ही हिंदी UN की भाषा न बन पाए किन्तु यह विश्व संवाद की दुसरे नंबर की भाषा बन चुकी है।”                                                                                                                               ऐसे समय जबकि दुनिया में प्रतिदिन हज़ारों बोलियाँ और सैकड़ों भाषाएँ मर रही हों तब हिंदी भाषा की उत्तरोत्तर बढती लोकप्रियता उसकी ताकत का एहसास कराती है| भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण जो 2010 में श्री गणेश दवे की अध्यक्षता में गठित किया गया था के अनुसार इस सदी  के अंत तक हिंदी को मातृभाषा मानने व् बोलने  वालो की संख्या  अंग्रेजी बोलने वालो के बराबर हो जाएगी। प्रख्यात मार्क्सवादी लेखक राम विलास शर्मा ने वर्षों पहले लिखे एक लेख में भारत की ह्रदय स्थली प्रान्तों उत्तर प्रदेश ,बिहार ,मध्य प्रदेश ,राजस्थान ,हरियाणा ,हिमाचल और उन से  सटे भू -भाग में हिंदी राष्ट्रीयता के मजबूत हो कर उभरने का उल्लेख किया है ,जिसका आधार ही हिंदी भाषा है।इन क्षेत्रो में रह रहे लोगो की राष्ट्र निर्माण और ज्ञान -विज्ञान की दुनिया में कुछ कर दिखने की जो ललक दिख रही है वह हिंदी की पहचान और प्रगति की सबसे बड़ी ताकत है। हाँ ,यह स्वीकारने में भी कोई झिजक नहीं है की हिंदी बाजारू भाषा है। लगभग 40 करोड़ की आबादी का हिंदी भाषी उपभोक्ता बाज़ार दुनिया के अंग्रेजीदां उत्पादकों को प्रतिस्पर्ध में बने रहने के लिए हिंदी जानने और अपनाने को विवश कर रहा है। बाज़ार के रास्ते ही सही हिंदी, दरबार ,न्याय और विश्व विद्ध्यालई भाषा का दर्ज पाने का सफ़र तय करेगी। जहा कभी विज्ञापन और मोडलिंग की दुनिया में हिंदी भाषी कार्मिको और विशेषज्ञों को हेय दृष्टि से देखा जाता था अब सर आँखों पर बैठाया जा रहा है। टीवी चेनल और समाचार पत्रों की बढती प्रसार संख्या हिंदी भाषा के पुष्ट होने का प्रमाण है।                                  हिंगलिश ही सही बाज़ार ,मोबाइल और इंटरनेट के जरिये गैर हिंदी भाषी लोगो तक हिंदी पहुंची ही नहीं अपितु उनमे इसेजानने  और प्रयोग में लेन की रूचि बढ़ी है। वैसे भी किसी भी सशक्त भाषा का इतिहास उठ कर देखलें वह अपने प्रारंभ काल में बाजारू और मिश्रित ही रही है| बाज़ारऔर जन संवाद  के यही दबाव अशोक काल में पाली के इस्तेमाल ,मुग़ल काल में अरबी -फ़ारसी के इतर उर्दू की स्वीकार्यता और फिर इंग्लिश के समानंतर हिंगलिश और फिर हिंदी को उसके वाजिब शिखर सम्मान की ओर गति देंगे। हाँ ,नेट की अंतर्राष्ट्रीय दुनिया में हिंदी को प्रतिस्पर्धा के लिए ब्लॉग ,वेब साईट की दिजाइनिग ,आलेख ,प्रस्तुति ,भाषा सौष्ठव, विषय वास्तु आदि जैसे तकनिकी विधाओं में पारंगत होना होगा। भविष्य हिंदी का है। दुनिया हमारे हुनर ,मेधा और क्षमता की कायल है। हिंदी प्रेमी नौजवान पीढ़ी अंतर्राष्ट्रीय जगत में जिस विशिष्ट पहचान के लिए तड़फ रही है वह उसे भारतीयता की जड़ों में और फिर हिंदी अपनाने से ही मिलेगा ,यह तय है। आइये ! हिंदी दिवस पर अधिकाधिक प्रयोग का संकल्प ले इस अभियान में योगदान दे।                                                              

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