दो बूँद न्याय की ,ताकि स्वस्थ रहे लोकतंत्र ।

                                                                                                                                      देहरादून –इधर कुछ समय से न्यायपालिका  की सक्रियता ने राजनीतिक दलों और नेताओं की नींद उड़ा दी है । अपराधिक छवि वाले नेताओं के लिए विधानसभा और संसद पहुँचने के रास्ते अब बंद हो गए है साथ ही विभिन्न पार्टियों द्वारा चुनाव जीतने के लिए ,सत्ता में पहुँचने से पहले राजकोष के बूते जनता को भ्रमित करने और प्रलोभन दे कर वोट पाने के मंसूबे धाराशाही कर दिए गए है । इसके साथ ही राजनीतिक दलों को यह हिदायत भी दी गई कि जाती के आधार पर समुदायों को गोलबंद करने के लिए रैलियों और सम्मेलनों का आयोजन बंद किये जाए ।                                                                                                                     एक के बाद एक आये इन फैंसलों ने जहां सभ्य और स्वस्थ लोकतंत्र के बने रहने की उम्मीद को बलवती किया है । समाज के जागरूक और प्रबुद्ध तबके ने इन फैसलों का स्वागत किया है । यह दोनों फैसले हालांकि देर से आये है लेकिन , इन फैसलों से लोकतंत्र को स्वस्थ बनाय रखने में मदद मिलेगी ।  दागदार और अपराधिक छवि के लोगों के राजनीति में बढ़ते दखल ने  क़ानून -व्यवस्था और सुशासन को लगातार कमजोर किया । जिस कारण राजनितिक व्यवस्था और दलों दोनों पर से जनता का विश्वास डिगने लगा है ।                                                                                                                                         कथनी और करनी में अंतर के कारन पार्टियों में क्षेत्र ,भाषा ,धर्म और जाती से ऊपर उठ कर फैसले लेने की प्रवृति कमजोर पड़ गई है । चुनाव जीतना और उसके लिए सभी हथकंडे अपनाना उनकी प्राथमिकता में शुमार हो चुका है । लोकतंत्र के महत्वपूर्ण और अनिवार्य घटक राजनीतिक दलों से यह उम्मीद की जाती है कि वें लोकप्रिय ,जिम्मेदार और साफ छवि के व्यक्तियों को ही आगे बढ़ाएंगे लेकिन हुआ इसके विपरीत । इस कारण पार्टियों में समाजवाद ,ध्राम्निर्पेक्षिता और लोकतंत्र वैचारिक आधार समाप्त प्राय हो गएँ हैं । अपने इस कर्तव्य को भूल चुके राजनीतिक दलों को न्यायपालिका अपने फैसले से कर्तव्य बोध कराया है । दूसरी ओर एक अन्य फैसले में अदालत ने चुनावी घोषणा पत्रों के जरिये जनता को भ्रमित करनेवाले लोकलुभावन वायदे करने पर रोक लगाने की हिदायत चुनाव आयोग  को दी है ।                                                                                वस्तुत: राजनीतिक दलों के घोषणा -पात्र शासन की नीतियों मौजूदा आर्थिक स्थिति के यथार्त से परे नेताओं की चुनावी जीत की मजबूरियों पर ज्यादा केन्द्रित होते है। जिस राजकोष के खर्च का फैसला सदन बहुमत के आधार पर करता है उसके खर्च की घोषणा वे अनाधिकारिक तौर पर करने लगे थे ,जिस का असर राज्यों और देश की अर्थव्यवस्था पर से दिखने लगा है। इन घोषणा पत्रों में सस्ता राशन बांटने से लेकर बिजली ,लेपटोप , साईकिल ,आवास आदि के साथ बिना विचारे स्कूल ,सड़के ,हॉस्पिटल आदि घोषित करने की होड़ ने अनेक बार घोषणा पत्रों को उपहास का कारण भी बनना पड़ा है । किसी दल द्वारा सरकार न बना पाने की स्थिति में इन घोषणा पत्रों का कोई अर्थ पार्टी के लिए नहीं रहता यह सिर्फ शब्द जाल का पुलिंदा भर रह जाते है । सरकार बनाने की स्थिति में सरकार शासन पर बेजा दबाव बना कर उन्हें लागू कराने का प्रयास किया जाता है।

बेहतर होगा कि राजनीतिक दल चुनाव जितने के लिए जो प्रलोभन जनता को देना पसंद करते है ,उसका खर्च वे स्वयं वहन करे ,अपने साधनों से जुटाएं ,उसका बोझ जनता के कर ढाँचे पर न डालें ।

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